Poem

सस्ती है ना ?

जिंदगी कितनी सस्ती है ना ?

तेज धुप मे पसीना बहाती
बस, ट्रेन के पीछे दौड़ लगाती, मशक्कत  करती…
और मन मे यह ठानती की बस सुबह होने वाली ही है|
कभी फार्म की कतारों मे, कभी कारो की कतारों मे, जिंदगी कितनी सस्ती है ना?
एक पल मे आकाश को चूमने वाली, तो दूसरी और पाताल मे अपनी परछाई ढूँढने वाली
क्यूँ सस्ती है ना?
कभी बम कभी गोली, नेता की करतूत की काली स्याही को पीने वाली
क्यूँ सस्ती है ना ?
Advertisements
Standard